Thursday, November 28, 2013

Wednesday, May 26, 2010

ये हैं हमारे कमल किशोर सक्‍सेना


ये हैं मेरे अभिन्‍न मित्र और प्रेरक कमल किशोर सक्‍सेना। इन्‍हीं की प्रेरणा से मैने व्‍यावसायिक लेखन की दुनियां में कदम रखा था। पत्रकारिता भी इन्‍हीं के साथ रह कर सीखी। आजकल कमल जी पटना में हैं। एक दौर था जब पूर्वी उत्‍तर प्रदेश के व्‍यंग्‍य लेखकों में श्रद्धेय केपी सक्‍सेना के बाद अगर किसी व्‍यंग्‍य लेखक को पहचाना जाता था तो वह हमारे कमल किशोर सक्‍सेना ही थे। दैनिक जागरण में वह नियमित रूप से छपते थे। रेडियों के लिए इन्‍होंने तमाम 'हवामहल' लिखे। 'सस्‍ते दामाद की दुकान' उनकी चर्चित व्‍यंग्‍य रचना थी। वक्‍त के थपेड़ों ने इनकी सारी मेधा को दारू में डुबो दिया। अब नए सिरे से लिखना शुरू किया है। मेरी ओर से बहुत बहुत शुभकामनाएं। इन्‍होंने अपना एक ब्‍लाग भी अभी हाल ही में बनाया है।
मित्रों वक्‍त मिले तो कमल जी के ब्‍लाग कमल के किस्‍से डाट ब्‍लागस्‍पाट डाट काम पर अवश्‍य लॉगइन करें।

Saturday, March 20, 2010

जियो तो ऐसे…………..

गौर से देखें तो पाएंगे, जिंदगी हर कदम एक नया सब‍क देती है। जाने अनजाने, हम उस सबक को पढ़ते हैं। भूल जाते हैं, लेकिन इससे वह सबक निष्‍प्रयोज्‍य नहीं हो जाता। वह हमारे अंदर कहीं न कहीं अपनी एक जगह बना लेता है। भाषा के स्‍तर पर। संवेदना के स्‍तर पर। सोच के स्‍तर पर। नजरिए के स्‍तर पर……।
याद नहीं, वह दिन कौन सा था। उस दिन, जिंदगी के एक नए सफर की तैयारी हुई थी। नए अनुभव की तैयारी। बड़े चौराहे से लौटते हुए अचानक परवेज लंगड़े ने आवाज दी, तो मैं उसकी दुकान की ओर बढ़ गया।
दरअसल तारा देवी और स्‍टेज प्रोग्राम के चक्‍कर में मैं परवेज लंगड़े वाली योजना को भूल ही गया था।
दुकान पर पहुंच कर, दुआ सलाम के बाद वहीं चप्‍पलों की एक गठरी पर बैठ गया। कैसे हो परवेज भाई…..मैने सवाल किया। मै तो ठीक हूं यार तुम कैसे हो….परवेज ने मेरी ओर देखा।
ठीक हूं…मैने जवाब दिया। वो, क्‍या है कि तारा देवी गुप्‍ता के साथ स्‍टेज प्रोग्राम कर रहा था। इसी लिए इधर आना नहीं हुआ। ठीक है यार, कुछ न कुछ करते रहना चाहिए। परवेज ने मुझे प्रोत्‍साहित किया और साथ ही एक हांक मारी।……….अरे ओ कलुआ। दो चाय ले आ मलाई मार के। यार आया है अपना। परवेज एक बार फिर मुझसे मुखातिब हुआ। कानपुर चलेगा…..माल लेने जाना है। चल, घुमा के लाता हूं ?
मैने भी सहमति में सिर हिला दिया।
चाय आ गई थी। वही धरमशाले के सामने के ठेले वाले की चाय। 15 पैसे की एक कप। गजब का स्‍वाद होता था उस चाय में। पूरे उन्‍नाव में इससे सस्‍ती चाय कहीं नहीं मिलती थी। यही वजह थी कि सुबह से शाम तक वहां लाइन नहीं टूटती थी। ऐस लगता था जैसे पूरा शहर चाय पर ही जिंदा है। सबको चाय चाहिए। खैर, चाय खत्‍म कर हम दोनो दुकान से उठे ओर पूड़ी वाली गली होते हुए रेलवे स्‍टेशन आ गए। रास्‍ते में परवेज ने विल्‍स की एक सिगरेट भी पिलाई। उस समय चार आने की एक सिगरेट आती थी। मैं तो दस पैसे वाली रीजेन्‍ट से ही काम चला लेता था, लेकिन जब परवेज साथ होता था तो वह मुझे रीजेंट नहीं पीने देता था। जेब में भरी नोटों की गड्डी पर हाथ मार कर बोलता था- यार, कमाते किस दिन के लिए हैं, खाओ पिओ, ऐश करो, क्‍या रखा है इस दुनिया में। सब यही रह जाना है। सच, परवेज की इस बिंदास तबीयत पर मैं फिदा था। कोई चिंता नहीं, न पढ़ाई की, न लिखाई की, न परिवार की, न घर की, बार की, न व्‍यापार की। जो मिला पहना, जो मिला खाया, जहां नींद आई वहीं सो गए। बिल्‍कुल अलमस्‍त। फकीरों से भी कहीं आगे। ……..और एक मैं था। चिंताओ का पिटारा। क्‍या खाऊं, क्‍या पहनूं, क्‍या पढूं, कहां जाऊं, क्‍या करूं। ओफ……….लगता था पागल हो जाऊंगा।
मैं अभी विचारों के समुंदर में तैर ही रहा था कि परवेज ने मेरी पीठ पर एक धौल जमाई- अरे कहां गुम हो गए शहजादे।
वह जब ज्‍यादा मस्‍ती में होता, तो मुझे इसी नाम से पुकरता था।
ट्रेन आ चुकी थी। वही बालामऊ पैसिंजर। दूधियों की ट्रेन। जिसपर रेलवे का कोई कानून लागू नहीं होता। किसी को बींड़ी सिगरेट लेना रह गया हो तो ड्राइवर या गार्ड को हांक मार कर अगली क्रासिंग पर ट्रेन रुकवा लेता, और फिर वापस आकर हॉक मार देता। हां, भाई चलो ड्राइवर साहब। और ट्रेन फिर चल देती। सिर्फ इतना ही नहीं ,कालेज गोल कर पिक्‍चर देखनी हो तो भी इससे मुफीद कोई और सवारी नहीं। डेढ़ रुपये का आना-डेढ़ रुपये का जाना।
परवेज के साथ मैं भी ट्रेन में सवार हो गया। परवेज बता रहा था कि आजकल धंधा ठीक चल रहा है। लखनऊ चारबाग रेलवे स्‍टेशन की छोटी लाइन की फुटपाथ पर फड़ लगा कर अच्‍छी कमाई हो रही है। मूलगंज से माल (चप्‍पलें) उठा कर लखनऊ भेजना है।
‘ एक चप्‍पल की कीमत क्‍या होगी ’-मैं भी धंधे की बारीकियां समझने की कोशिश करने लगा। परवेज बता रहा था। थोक में एक जोड़ी चप्‍पल साढ़े सात रुपये की पड़ती है और बीस से पच्‍चीस रुपए जोड़ी में आसानी से बिक जाती है। और ज्‍यादा कमाई करनी हो तो रिपिट का काम और जोड़ लो। मेरे पास तो कोई लड़का नहीं है। वरना नोट तो बोरों में भरके लाऊं।
उस दौरान परवेज की बातें सुन कर ऐसा लगता था कि दुनियां में उससे धनवान और उससे बड़ा व्‍यापारी और कोई नहीं है। कभी-कभी तो मैं तुलना करने लगता था। एक ओर होते थे पुराने जमाने के मैट्रिक पास मेरे पिता जी जो, हर महीने मां के साथ बैठ कर अपनी तनख्‍वाह के चंद हजार रुपयों का हिसाब किताब जोड़ते। मकान का किराया, दूध वाले का बिल, बिजली का‍ बिल, बच्‍चों की फीस, ईंधन, राशन, सब्‍जी और न जाने क्‍या-क्‍या। दोनों की बातचीत जब अंतिम पड़ाव पर पहुंचती तो कुछ इस तरह के फैसले होते। गुड्डन (मेरी छोटी बहन) की स्‍कूल की ड्रेस अगले महीने देखेंगे। काम वाली को हटा दें तो ठीक रहेगा।……….और दूसरी ओर अनपढ़ परवेज। एकदम अलमस्‍त। यार ओपी, चल तुझे कबाब पराठे खिलवाता हूं। मूलगंज में रोटी वाली गली तक तो चलना ही है। सामने कोई भिखारी आ गया, कोई लाचार दिख गया तो परवेज अपनी पूरी जेब भी खाली कर सकता था। मैं गवाह हूं इसका। कई बार माल लेने जाते वक्‍त ट्रेन में परवेज अपने सारे पैसे गरीबों में बांट दिया करता था। मैं पूछता, अब माल का क्‍या होगा ? वह हंस देता। होना क्‍या है, माल आएगा। जेब में पड़ी विल्‍स फिल्‍टर की डिब्‍बी और आखिरी बचे दस के नोट को हवा में लहराता हुआ वह ट्रेन में जुआ खेल रहे लोगों के बीच जा कर बैठ जाता। गजब का कानफीडेंस था उसमें, जो पिताजी में कभी देखने को नहीं मिला।
पिताजी खर्च में जितना कतर ब्‍यों करते, उतना ही दुखी नजर आते। परवेज जिस बेतरतीबी से खर्च करता, उतना ही मस्‍त नजर आता। मै भी मन ही मन फैसला कर लेता हूं। एक बार जरूर इसके धंधे में हाथ डाल कर देखूंगा। उस समय परवेज मेरा रोल मॉडल बन गया था। एक पैर से कमजोर होने के बावजूद गजब की हिम्‍मत थी उसमें। गजब की जिंदादिली। वह अक्‍सर कहता था-‘ शहजादे, जियो तो ऐसे, जैसे कि सब तुम्‍हारा है, मरो तो ऐसे, जैसे तुम्‍हारा कुछ भी नहीं ।’
ट्रेन कानपुर पहुंच जाती है। हम दोनो पैदल-पैदल घंटाघर पहुंचते हैं, और वहां से रिक्‍शा पकड़ मूलगंज। चौराहे पर उतरते ही दाहिनी ओर मेस्‍टन रोड जाने वाले रास्‍ते के शुरू में ही बाएं किनारे पर पुलिस चौकी और फिर लगभग सौ कदम आगे चलते ही दुकानों के बीच से जाने वाली कुछ पतली-पतली गलियां और उनमें ताक-झांक करते कुछ लोग।
इन गलियों की चर्चा तो बहुत सुनी थी। देखने का मौका आज मिला। यह कानपुर की बदनाम बस्‍ती थी। थी, इस लिए कि अब वहां ऐसा कुछ भी नहीं है।
(क्रमश:)

Monday, January 25, 2010

एक वर्ष बाद

पूरे एक वर्ष बाद आज फिर लिखने बैठा हूं। जैसा कि मैने पहले ही कहा था कि किसी भी काम को शुरू करना बहुत मुश्किल होता है, और उसे अंजाम तक पहुंचाना और भी मुश्किल। वक्‍त के थपेड़े कहां से कहां उड़ा ले जाते हैं। ऐसा ही एक थपेड़ा मुझे भी लगा, अभी पिछले दिनों। तो ब्‍लाग पर कोई पोस्‍ट डालने का मौका ही नहीं लगा। जिंदगी को सहेजने में ही
पूरा एक साल बीत गया। आज मैं बहुत खुश हूं। पहली खुशी इस बात की कि एक दोस्‍त के एसएमएस ने नए सिरे से लिखने का हौसला दिया है। उसका एसएमएस था- सुना था जि़दगी इम्‍तहान लेती है, मगर ये साले इम्‍तहान तो जिदगी लेने पर लगे हैं।
जाने क्‍यूं इस एसएमएस ने एक बार फिर लिखने का हौसला दिया है। मुझे लगा कि इम्‍तहान तो चलते रहेंगे। जिंदगी इतनी आसान नहीं कि कोई इम्‍तहान इसे समेट ले जाए। रही दूसरी खुशी की बात तो वह यह कि आज मुझे अपना 21 साल पहले खोया हुआ एक दोस्‍त मेराज जैदी मिल गया। उसकी तस्‍वीर भी मिली जो इस पोस्‍ट के सा‍थ आपके सामने है। अपनी पिछली पोस्‍ट में मैने उसका जिक्र किया था कि उसने ही उन्‍नाव की कचहरी में एक वकील के यहां मुझे मुंशीगीरी का काम दिलाया था। उस समय वहां कचहरी में उससे अच्‍छा कोई मुंशी नहीं था। आज पता चला कि वह मुम्‍बई में है। उससे आज फोन पर बात भी हुई। टीवी सीरियल्‍स के लिए स्क्रिप्‍ट एवं डायलाग लिख रहा है।
मेराज से बात कर आज फिर मुझे वही शेर याद आ रहा है जिस शेर पर मैने अपनी पिछली पोस्‍ट को समाप्‍त किया था:- खुली छतों के दिये कब के बुझ गए होते, कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है।सच, हम सभी दोस्‍त खुली छतों के दिये जैसे ही तो थे। आज मेराज के रूप में एक खोया हुआ दिया मिला है जो मुम्‍बई में अपनी रोशनी बिखेर रहा है। मुझे उम्‍मीद ही नहीं भरोसा है कि हमारी दोस्‍ती के दिये जहां जहां भी होंगे, वहां रोशनी की कोई कमी नहीं होगी।
मित्रों, अगली पोस्‍ट में अपनी उसी कहानी पर वापस लौटूंगा जहां से मैं अचानक लापता हो गया था। कोशिश करूंगा कि हर सप्‍ताह कम से कम एक पोस्‍ट आपको जरूर पढ़ने को मिले।
नेट से मेराज को जो प्रोफाइल मिला है वह इस प्रकार है:-
MAIRAJ ZAIDI (born 22.11.1949 at Chaudhrana, Unnao)
Stage Artist & Dialogue Writer.
Stage Plays'Agra Baazar' directed by Habib Tanveer (68 shows ).'Charan Das Choor' directed by Habib Tanveer (8 shows).Contribution : He acted in these Plays.
'Curfew' adopted from Novel 'Shahar Mein Curfew' written by Vibhuti Narain Rao'Tamacha' 'Raj Darshan'Contribution : Direction, Screen Play, Acting & Dialogue Writing.
T.V. Serials 'Raja Ka Baaja' directed by Sayeed Mirza (27 episodes have been telecast on DD-I)'Farz' : Nimbus Productions (17 episodes.)'Chamatkaar' directed by Partho Ghosh. (6 episodes)'Rishtey' (Telecast on Sony)Contribution: Dialogue Writing.'Ghadar - 1857' based on The First war of Independence directed by Sanjay Khan.Contribution: Research Story, Screen Play & Dialogue Writing.


Friday, January 30, 2009

धार्मिक होना भी जरूरी
धर्म चाहे कोई भी हो, मेरा मानना है कि व्‍यक्ति का धार्मिक होना भी जरूरी है। आज हम जिस हिंदू मुसलमान सिख या ईसाई के नाम पर आपस में लड़ते झगड़ते हैं, वह वास्‍तव में धर्म नही है। हिंदू, मुस्लिम, सिख या ईसाई तो अलग अलग संप्रदाय हैं। हम उनके अनुयायी मात्र हैं। संप्रदायों में वर्चस्‍व को लेकर झगड़ा हो सकता है। धर्म पर कोई झगड़ा नहीं। मेरा मानना कि, धर्म हमें संकटों से उबरे की शक्ति देता है। धर्म हमें अपने कर्तव्‍य मार्ग पर चलन की प्रेरणा देता है। जब हम यह मानते हैं कि इस सृष्टि से अलग कोई एक सर्वशक्तिमान है और हम सब की डोर उसके हाथ में है, तो हम बड़े से बड़े संकट के समय में भी रिलैक्‍स हो जाते है। एक तरह से कहा जाए तो धर्म आस्‍था और विश्‍वास का दूसरा नाम है। वह अलग बात है कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण इससे बिल्‍कुल अलग है। उनकी भाषा में यही कहा जाता है कि जहां विश्‍वास होता है वहां ज्ञान नहीं होता, लेकिन कभी कभी मानसिक शांति के लिए ज्ञान शून्‍यता एवं विचार शून्‍यता एक औषधि का कार्य करती है। संभवत: इसे ही ध्‍यान कहते हैं। जो व्‍यक्ति इस स्थिति से गुजर जाता है वह वह बड़े से बड़े संकट का सामना कर अपने आप में एक ऐसी ऊर्जा का समावेष कर लेता है जो जीवन पथ पर आगे बढ़ने में उसकी मदद करती है।
यहां धर्म चर्चा मैं सिर्फ इस लिए कर रहा हूं कि जिन संकटों से गुजर कर मेरे पिता जी ने अपने परिवार को संभाला वह ईश्‍वर के प्रति उनकी अगाध आस्‍था और विश्‍वास का ही परिणाम था। ऐसा वह अक्‍सर कहा करते थे....और यह आस्‍था एवं विश्‍वास उन्‍हें अपने पूर्वजों से संस्‍कार में मिला। कुछ ऐसे ही संस्‍कार मुझमें भी रहे। मेरी ननिहाल में तो भक्ति रस की गंगा बहती थी। हमारे नाना बाराबंकी के पीरबटावन मोहल्‍ले में रहा करते थे। अक्‍सर गर्मियों की छुट्टियों में हम लोग वहां जाया करते थे। नाना जी का नियम था कि वह सुबह चार बजे सभी को जगा दिया करते थे और फिर खुद हारमोनियम लेकर प्रभाती गाते थे और हम सभी उनके साथ स्‍वर मिलाया करते थे। उनकी वह प्रभाती आज भी मुझे याद आती है........जागिए कौशल किशोर पंछी गण बोले, जागिए कौशल किशोर।
मुझे अभी भी याद है जब नाना जी रेलवे से रिटायर होने के बाद घर में ही ईश्‍वर भजन में लीन रहते थे। इसके अलावा उन्‍हें होम्‍योपैथी का भी अच्‍छा ज्ञान था इस लिए वह अपनी पेंशन के कुछ पैसों से दवाएं खरीद कर लाते थे और मोहल्‍ले के उन लोगों का नि:शुल्‍क इलाज किया करते थे जो गरीब थे। छुट्टियों में हम लोगों के पहुंचने पर वह हमे अपने साथ विभिन्‍न संतों के सत्‍संग में ले जाते थे। घर में खाली समय मिलता तो वह हमे रामायाण, सुख सागर और गीता जैसे ग्रंथ देकर कहते कि हम उसे पढ़ कर उन्‍हें सुनाएं। इस प्रक्रिया का लाभ आज हमें समझ में आता है। बचपन में विभिन्‍न धर्मग्रंथों के पाठ ने जहां हमारी भाषा को समृद्ध किया वहीं धर्म के प्रति हमारी आस्‍था को मजबूत किया। इसी ने हमें गरीबों की सहायता, दीन दुखियों की मदद और सत्‍य की राह पर चलने का हौसला भी दिया। काम, क्रोध, लोभ, मोह से मुक्‍त होने की सीख दी।
वह अलग बात है कि, जीवन की राहों पर जिस नए सत्‍य से हमारा साक्षात्‍कार हुआ उसके चलते हम तमाम बार व्‍यक्गित हितों के लिए इन राहों से भटके। कभी जानबूझ कर तो कभी अनजाने में......लेकिन अच्‍छे संस्‍कारों ने हमें हमेशा बाचाए रखा। मैने कभी भी यह दावा नहीं किया कि मैं सत्‍यवादी हरिश्‍चंद हूं। मैं एक आदर्श व्‍यक्ति हूं। मेरा अनुकरण किया जा सकता है। ऐसा मैने कभी नहीं कहा। मैं हमेशा एक सामान्‍य व्‍यक्ति की तरह जिया। देश, काल और परिस्थितियों के अनुरूप समय-समय पर बदलता रहा। .........क्‍यों कि मैं जानता था कि इस परिवर्तनशील समय में अगर मैने अपने आप को नहीं बदला तो जीवन की दौड़ में कहीं पीछे छूट जाऊंगा।
मैं पीछे छूटना नहीं चाहता था। कर्म को प्रधान मानते हुए मैं कोशिशों में लगा रहा। कुछ दिनों बाद मेराज ने बताया कि उसने एक वकील साहब से बात की है। अगर मैं चाहूं तो उनके यहां मुंशी का काम कर सकता हूं। मेराज की बात सुनकर मैने भी हां कर दी और अगले दिन से काम पर पहुंच गया। बड़े मुंशी ने मुझे मुकदमों से संबंधित कोर्ट के कागजात तैयार करने बताए। पांच रूपये रोज पर बात तय हुई थी। मैं पूरी मेहनत और लगन से काम करने लगा। शाम को बड़े मुंशी कचहरी से मेरे साथ सब्‍जी मंडी तक पैदल आते थे और वहां से सब्जियां खरीद कर अपने बच्‍चों के लिए कु्छ न कुछ मिठाई आदि लेकर तब घर जाते थे। बड़े मुंशी की ड्यूटी सुबह आठ बजे वकील साहब के घर से शुरू होती थी। वकील साहब के घर का सामान लाना। मिलने जुलने आने वालों को चाय आदि पिलाना भी बड़े मुंशी की ड्यूटी में शामिल था। इसके बाद वह दस बजे कचहरी आ जाते थे। पूरे दिन काम कर मुंशी जी को तीस से चालिस रुपये रोज की आमदनी थी। इसी आमदनी से उनके परिवार का भरण पोषण होता था। मुंशी जी भी अपनी इस स्थिति से पूरी तरह संतुष्‍ट थे। वह बताते थे कि, वह जब कचहरी पहली बार आए थे तो उनकी उम्र सिंर्फ अठारह साल की थी और आज वह 40 वर्ष के हैं। मुंशी जी की बातें मेरे अंदर विचारों का एक ऐसा तूफान खड़ा कर देती थीं कि मैं कभी कभी तो घंटो मुंशी जी के बारे में ही सोचता रह जाता था, और फिर अपने आप से यह सवाल करता था कि क्‍या मैं भी मुंशी जी की तरह ही..................।
नहीं नहीं , मैं बहुत तेजी के साथ अपना सिर झटक देता था। इतने से गुजारा नहीं होगा। वह और बात थी कि जब से मैने कचहरी जाना शुरु किया था मैंने अपने खर्च के लिए घर से पैसे लेना बिल्‍कुल बंद कर दिया था। बीच बीच में तारा देवी गुप्‍ता के स्‍टेज प्रोग्राम भी मिल जाते थे। इस तरह कहा जाए तो अपनी गाड़ी सरकने लगी थी। सिगरेट पान और लेखन सामग्री का खर्च निकलने लगा था। यदा कदा सरिता, मुक्‍ता और गृहशोभा में रचनाएं भी छपने लगी थीं। मैने इंटरमीडिएट का प्राइवेट फार्म भर दिया था। मुझे अपने आप पर विश्‍वास था और ईश्‍वर पर भरोसा, साथ ही जहन में गूंजता किसी शायर का वह शेर-
खुली छतों के दिये कब के बुझ गए होते।
कोई तो है जो हवाओं के पर कतरता है।।
(क्रमश:)

Thursday, January 22, 2009


छोड़ें नहीं उम्‍मीद का दामन

बुजुर्गों से सुना था कि उम्‍मीद का दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए। सो, उम्‍मीद के उसी दामन को थामे मैं भी आगे बढ़ा। सुबह नित्‍य क्रिया कर्म से निवृत्‍त होकर मैं फिर कमल के घर की ओर चल दिया। पूरे दिन वही पोस्‍टर बनाने का सिलसिला चला और रात में तारा देवी गुप्‍ता के स्‍टेज प्रोग्राम की कम्‍पेयरिंग कर देर रात घर वापिस आया। तारा देवी ने कहा था कि आगे जब भी प्रोग्राम होगा वह मुझे खबर करवा देंगी। अगले दिन सुबह उठा तो कोई तय कार्यक्रम नहीं था। पिताजी के आफिस जाने के बाद घर से निकला तो कचहरी में मेराज के बस्‍ते पर जा पहुंचा। मेराज बड़ी ही तन्‍मयता के साथ वादकारियों के वकालतनामे और अप्‍लीकेशने लिखने में लगा था। मुकदमों से सम्‍बंधित तरह तरह के फार्म थे जिन्‍हें वह भर रहा था। हर एक फार्म भरने के उसे दो रुपये मिलते थे। अपने काम के बीच से ही समय निकाल कर वह मुझे चाय पिलाने ले गया। चाय पीने के दौरान मैने उससे कहा कि वह मुझे भी कोई काम बताए। ....मेराज ने मुझे आश्‍वस्‍त किया कि वह अपने वकील साहब से इस बारे में बात करेगा।
इसी तरह घूमते फिरते फिरते दिन गुजर गया। शाम को घर पहुंचा तो पिताजी कचहरी से बापिस आ चुके थे। मां, उनके लिए चाय और भूजा बनाने में लगी थी। शाम के नाश्‍ते में पिताजी अक्‍सर भूजा ही लेते थे। भूजे का मतलब होता था भूने हुए चने मुरमुरे और उसमें बारीक कटी प्‍याज के साथ लहसुन में पिसी लाल या हरी मिर्च को मिला कर थोड़ा सा कच्‍चा सरसों का तेल और नमक........क्‍या गजब का स्‍वाद होता था उस भूजे में, जिसे पुरानी यादें ताजा करने के लिए मैं आज भी कभी कभी खाता हूं।
उस शाम भी मैं अपने दोनों छोटे भाई बहनों के साथ पिताजी के साथ भूजा खाने के लिए बैठ गया था। .....और पिता जी ने हमेशा की तरह अपने बचपन के किस्‍से सुनाने शुरू कर दिये थे।...........सच, गर्दिश के दिनों मं बीता हुआ कल और उसकी यादें जीने का एक बहुत बड़ा सहारा होती हैं। यह बात अब जाकर हमारी समझ में आई, उस समय तो जब पिताजी अपने बीते दिनों के किस्‍से सुनाते थे तो बड़ी बोरियत महसूस होती थी लेकिन वह एक ही किस्‍से को सौ बार सुना कर भी नहीं थकते थे........।
उस दिन भी पिताजी बता रहे थे कि कि राजशाही के दौर में जब उन्‍होंने मैट्रिक पास कर लिया तो उनके पिताजी ने कहा कि वह नौकरी के लिए दरबार में राजा साहब के सामने पेश हों। .....चूंकि उस समय तक पिताजी के सहपाठी कुंवर विभूति नारायण सिंह का राजतिलक हो चुका था, इस लिए वह ही महाराजा बनारस थे। ऐसे में पिता जी की समस्‍या यह थी कि वह अपने दोस्‍त के सामने किस तरह दरबार में झुक कर फर्शी बजाएंगे (फर्शी, राजा महाराजाओं के दरबार में राजा को दिया जाने वाला वह सम्‍मान है जिसमें राजा के सामने आने वाला शख्‍स घुटनों तक झुक कर अपने दाएं हाथ को सलाम करने की मुद्रा में कई बार माथे तक लेजाते हुए महाराज की जय हो शब्‍द का उच्‍चारण करता है)। यही वजह थी कि पिताजी ने अपने पिताजी को उस समय साफ-साफ यह कह दिया कि नौकरी मिले या न मिले, वह दरबार में फर्शी बजाने नहीं जाएंगे। इस पर, पिता जी के पिताजी, यानि हमारे बाबा जी ने उन्‍हें समझाया कि दरबार में महाराजा विभूति नारायण सिंह तुम्‍हारे दोस्‍त और सहपाठी नहीं बल्कि इस स्‍टेट के राजा होते हैं और राजा की गद्दी का सम्‍मान करना प्रजा का धर्म होता है। और फिर जब हम नौकरी करते हैं तो हम नौकर ही होते हैं और नौकर चाहे दस पैसे का हो या दस लाख का, नौकर सिर्फ नौकर होता है। नौकर की अपनी कोई हैसियत नहीं होती। शास्‍त्र भी यही बताते हैं। दरबार में तुम महाराजा बनारस के सामने फर्शी बजाओगे अपने दोस्‍त या सहपाठी के सामने नहीं।
पिताजी ने आगे बताया था कि वह काफी समझाने बुझाने के बाद नौकरी की दरख्‍वास्‍त लेकर महाराजा बनारस के दरबार में पेश हुए और उनकी दरख्‍वास्‍त पर महाराजा बनारस ने तत्‍काल उन्‍हें बनारस स्‍टेट के गाड़ीखाने का इंचार्ज बना दिया था। इस नियुक्ति के साथ ही पिता को यह आदेश भी मिला था कि गाड़ीखाने का सारा काम देखने के साथ ही साथ उन्‍हें दिन और रात में राजा साहब की मर्जी के अनुसार उनके साथ बैडमिंटन और फुटबाल खेलना होगा।
इस तरह मेरे पिताजी को उनकी पहली नौकरी मिली थी। उनका अधिकांश समय बनारस में गंगापार रामनगर के किले में ही बीतता था। वह यह भी बताते थे कि एक समय जब हमारे बाबा जी जीवित थे और हमारी दादी बाजार में खरीदारी करने जाती थीं तो आठ घोडों की फिटन उन्‍हें लेने आती थी, और पूरा बाजार खाली करा दिया जाता था। ...............सचमुच संपन्‍नता और रुतबे से भरी जिंदगी की यादों को कौन भुलाना चाहेगा। ..और फिर गुरबत के दिनों को उन यादों के सहारे यह सोचते हुए बिताना थोड़ा आसान हो जाता है कि , आज नहीं है, तो क्‍या हुआ। हमें मलाल नहीं कि हमने रईसी नहीं देखी।
एक और खासबात यह कि पिताजी जब राजशा‍ही खत्‍म होने के बाद अपने स्‍ट्रगल के किस्‍से सुनाते थे जो उसमें एक अलग तरह का थ्रिल , एक अलग तरह का रोमांच तो होता ही था, साथ ही उनकी साफगोई भी झलकती थी। वह बताते थे कि राजशाही खत्‍म होने के बाद जब उनके पिताजी का देहावसान हो गया और वह लोग रामनगर से बनारस आ गए तो परिवार में सबसे बड़े होने के नाते अपने आठ भाई बहनों और मां की प‍रवरिश की जिम्‍मेदारी भी उन्‍हीं की थी। राजशाही गई तो नौकरी भी चली गई। इधर उधर दौड़भाग कर किसी तरह रोडवेज में कंडेक्‍टर हो गए। बनारस से चकिया के रूट पर उनकी ड्यूटी लगी। कंडक्‍टरी की नौकरी में मिलने वाली तनख्‍वाह से इतने बड़े परिवार का गुजार कैसे चले इस लिए हमेशा उधेड़बुन रहती थी। इसी बीच उन्‍हें एक ऐसा ड्राइवर मिला जो बेहद तेज था। उसी ने पिता जी को बताया कि किस तरह सरकारी नौकरी में ऊपर की कमाई की जाती है। पिताजी बताते थे कि उस ड्राइवर के इशारे पर वह किस तरह बिनाटिकट यात्री ले जाते थे और उससे होने वाली अतिरिक्‍त कमाई से अपने भाई बहनों के लिए चकिया के मशहूर लडडुओं की हांडी, जिसे पाकर भाई बहनों के चेहरों पर आने वाली खुशी उन्‍हें उनके द्वारा की जाने वाली चोरी का अहसान नहीं होने देती थी। ...लेकिन साथ ही वह मुझे यह हिदायत भी देते जाते थे कि चोरी और बेईमानी की कमाई में बरकत नहीं होती। कभी भी बुरे दिन आएं तो उम्‍मीद का दामन नहीं छोडना चाहिए क्‍यों कि हर अंधेरी रात के बाद सुबह होती है....जिसे उम्‍मीद होती है, वही सुबह की रोशनी देखता है, जिसके हाथ से छूट जाता है उम्‍मीदों का दामन , वह खो जाता है अंधेरों में.......।
आज सोचता हूं, कि जिंदगी में सट्रगल के अपने किस्‍से सुनाने के पीछे शायद पिताजी का एक मकसद होता था। वह मुझे सिर्फ किस्‍से नहीं सुनाते थे, बल्कि मुझे आने वाली जिंदगी से जूझने के लिए मानसिक रूप से तैयार करते थे, मुझे ताकत देते थे।

(क्रमश:)

व्‍यंग्‍य
मंदिर-मस्जिद और कमला
जाने क्‍यूं मुझे मंदिर-मस्जिद और कमला में कोई फर्क नजर नहीं आता। अब सवाल यह होगा कि कमला कौन है। शायद आप भी भूल गए होंगे कमला को। मैं उसी कमला की बात कर रहा हूं, जिसे एक पत्रकार सत्‍तर के दशक में मध्‍यप्रदेश के किसी सुदूर गांव में लगने वाली औरतों और लड़कियों की हाट से खरीद कर लाया और फिर देखते ही देखते कमला पूरे देश में छा गई।
अखबारों में कमला पर बड़े-बड़े संपादकीय छपे, राजनीतिज्ञों ने कमला के नाम पर जिंदा गोश्‍त की खरीद-फरोख्‍त के विरुद्ध धरना, प्रदर्शन और ज्ञापनों का हड़बोंग किया और अपनी नेतागीरी चमकाई। कविताएं, कहानियां, नाटक और उपन्‍यास ही नहीं, कमला को लेकर फिल्‍म तक बनी और लोगों ने लाखों कमाए। अपने आप को प्रतिष्ठित किया। उधर कमला को खरीद कर लाने वाले पत्रकार रातों रात खोजी पत्रकार के रूप में प्रतिष्ठित हो गए। लेकिन कमला.........! उसका कुछ पता नहीं कि वह नारीनिकेतन की गलाजत भरी जिंदगी से भागने के बाद कहां गई....किसी ने यह जानने का प्रयास भी नहीं किया। ठीक इसी तरह हमारी भारतीय जनता पार्टी, जिसने जनसंघ से भाजपा होने तक का सफर कमला अर्थात किसी ऐसे मुद्दे (मंदिर-मस्जिद) की तलाश में बिताया, जो उसे किसी शक्तिशाली राकेट की तरह अंतरिक्ष रूपी सत्‍ता में प्रतिस्‍थापित कर दे।....और फिर वह दिन भी आया, जब भाजपाई अपनी सिस्‍टर इकाई विश्‍व हिंदू परिषद के माध्‍यम से एक कमला उठा लाए। या यूं कहिए कि राम जन्‍म भूमि और बाबरी मस्जिद का मुद्दा उठा लाए। फिर वही सत्‍तर के दशक का सा वातावरण बना। अखबारों में बडे बडे संपादकीय लिखे जाने लगे। धरना प्रदर्शन और ज्ञापन के जरिए तमाम सड़कछाप लोग नेता बन गए। र‍थ यात्राओं से लेकर पथ यात्राओं तक न जाने क्‍या क्‍या हंगामे हुए। ....और नतीजा बिल्‍कुल वही, जैसे कमला को लाने वाला पत्रकार रातों रात खोज पत्रकार के रूप में प्रतिष्ठित हो गया था उसी तरह भारतीय जनता पार्टी भी एक बड़ी सशक्‍त पार्टी के रूप में प्रतिष्‍ठापित हो गई। कई स्‍थानों पर सत्‍ता भी हथिया ली।
इस सब के बाद पत्रकार अर्थात मीडिया और भाजपा की स्थि‍त में कमला को लेकर बहुत जरा सा परिवर्तन आया और वह यह कि जहां मीडिया ने अपने व्‍यापार के लिए दुधारू गाय के रूप में मिली कमला को लेकर यह मन बना लिया कि कमला चुक जाएगी तो उसकी जगह थाने में बलात्‍कार का शिकार हुई मथुरा होगी। मथुरा नहीं तो शालनी, कुसुम, बेलछी, सुंदूर या फिर कुम्‍हेर जैसा कुछ........।
उधर भाजपा के पास सिर्फ कमला यानि राम जन्‍मभूमि और बाबरी मस्जिद है। जब चाहेंगे वह इस कमला के बदन के एक भाग से कपडे हटाएंगे और फिर चीखेंगे...देखो, लड़की नंगी है, हमे इसे कपड़े पहनाने हैं। वो लोग हमे कपड़े नहीं पहनाने दे रहे है। और अगर किन्‍हीं परिस्थियों में यह कमला चुक गई तो मथुरा और काशी विश्‍वनाथ मंदिर जैसी तमाम कमलाएं वह और जुटा लेंगे। व्‍यापार चलता रहेगा। कहीं कुछ नहीं बदलेगा। कमला, म‍थुरा, शालनी, कुसुम, बेलछी, सुन्‍दूर, कुम्‍हेर, राम जन्‍मभूमि-बाबरी मस्जिद, काशी विश्‍वनाथ, सब एज इट इज...।
जो होगा या हो रहा है, उसमें कमला के बाद दलितो व स्त्रियों के मामलों को आर्थिक सामाजिक एवं राजनीतिक लाभ उठाने का जरिया बना लिया गया। कमोबेश मंदिर-मस्जिद की स्थिति भी यही है।...रही मीडिया और जनता के ताजा दृष्टिकोण की बात तो वहां मीडिया की स्थिति तो जगजाहिर है....एक ही पन्‍ने पर एक ही समाचार में यह लिखा होगा कि राम जन्‍मभूमि देश की धार्मिक एवं सांस्‍कृतिक अस्मिता का प्रश्‍न है और इस अस्मिता को बचाए रखना बहुत जरूरी है... गर्भगृह पर ही मंदिर निर्माण होना चाहिए। साथ ही यह भी लिखेंगे कि मंदिर निर्माण की बात करने वाले सांप्रदायिक है। गर्भगृह पर मंदिर बना तो वह एक संप्रदाया विशेष के प्रति अन्‍याय होगा।......वास्‍तव में बंदनीय है हमारा मीडिया। पूरी तरह निश्‍पक्ष। इतना निष्‍पक्ष कि उसका अपना कोई दृष्टिकोण ही नहीं। थाली में जिधर ढलान मिली बैंगन उसी ओर लुढक गया।
इस तरह यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि आज मंदिर मस्जिद, कमला अर्थात धर्म शोषित और दलित गांव से लेकर केंद्र (दिल्‍ली) तक सत्‍तासित का नियामक तत्‍व है। इसी लिए चतुर राजनीतिज्ञों एवं धंधेबाज साम्‍प्रदायिक गुटों ने उनके अस्तित्‍व के सबसे छुद्र और संकीर्ण पहलुओं को उभारा, जिसका परिणाम सामने है...इस लिए जरूरी है कि मंदिर-मस्जिद और कमला पर नए सिरे से विचार हो।
(अमर उजाला के 4-8-1992 के अंक में प्रकाशित)

Thursday, January 15, 2009


असंतुष्‍ट रहो और आगे बढ़ो
संतोषम् फल दायकम् का सूत्र वाक्‍य जिस किसी भी विद्वान ने लिखा हो, मैं व्‍यक्तिगत रूप से उनसे सहमत नहीं हूं। जीवन की राहों पर चलते हुए मैने जो महसूस किया उसके अनुसार अगर आगे बढ़ना है तो असंतुष्‍ट रहना बहुत जरूरी है। उस दिन तारा देवी गुप्‍ता से मिल कर आने के बाद अगले दिन मैं पूर्व नियत कार्यक्रम के अनुरूप सुबह 10 बजे कमल के घर पहुंच गया। कमल के अन्‍य साथी मेराज जैदी, गिरजा शंकर अवस्‍थी, अरविंद, जागेश्‍वर भारती आदि सभी वहां पहले से मौजूद थे। पेंट ब्रश आदि लेकर हम सभी लोग नाटक राम रहीम के पोस्‍टर बनाने में लग गए। इसी काम के दौरान बातचीत में यह पता चला कि मेराज जैदी की भी साहित्‍य में खासी रुचि है। उर्दू साहित्‍य का बहुत अच्‍छा कलेक्‍शन उस‍के पास है। मेराज का दावा था कि उर्दू साहित्‍य हिंदी से कहीं अधिक समृद्ध है। चूंकि मैं उस पूरे ग्रुप में सबसे छोटा था और साहित्‍य के बारे में मेरी जानकारी भी अन्‍य सभी के मुकाबले नगण्‍य थी इस लिए मैं चुपचाप उन सभी की बातचीत सुनता रहा। बीच बीच में मैं भी हां हूं कर देता था। इस बीच मेराज उर्दू के कई लेखकों और उनकी रचनाओं का जिक्र करता रहा। मुख्‍य रूप से सआदत हसन मंटों एवं इस्‍मत चुग्‍ताई की कहानियों का जो वर्णन उसने किया उसने मेरे अंदर भी एक उन्‍हें पढने की इच्‍छा जाग्रत कर दी। लेकिन एक समस्‍या थी कि मैं उर्दू नहीं पढ सकता था। मैने अपनी बात मेराज के सामने रखी तो उसने बडी सहजता से कहा......उर्दू नहीं जानते तो क्‍या हुआ। तुम मेरे घर आओ, मैं तुम्‍हें मंटो और इस्‍मत चुगताई की कई अच्‍छी कहानियां पढ कर सुनाऊंगा। उसका कहना था कि वह कहानियां तो ऐसी हैं कि उसे चाहे जितनी बार पढो, वह न सिफ नई लगती हैं बल्कि व्‍यक्ति की संवेदनाओं को झकझोर कर रख देती हैं। .....मैने सहमति में सिर हिला दिया था।
शाम होते होते हम लोगों ने लगभग एक दर्जन पोस्‍टर बना डाले थे। बाकी पोस्‍टर अगले दिन बनाने की बात तय कर हम लोग कमल के घर से निकल पड़े। मैं वहां से सीधे घर आया और फिर कपडे आदि बदल कर रात के प्रोग्राम के बारे में मां को बताया। यह भी बताया कि लखनऊ वाले काम में अभी समय लगेगा। फिलहाल मैं आर्कस्‍ट्रा के प्रोग्राम में जा रहा हूं। मेरे घर से निकलने तक पिता जी कचहरी से वा‍पिस नहीं आए थे। मैं उनके आने से पहले ही घर से निकल लेना चाहता था क्‍योंकि उनके आने के बाद यह गारंटी नहीं थी कि वह मुझे किसी आर्केस्‍ट्रा पार्टी में काम करने देंगे या नहीं। उनकी समस्‍या यही थी कि वह आर्थिक रूप से परेशान भी रहते थे लेकिन उनकी शहंशाही में कहीं कोई कमी नहीं थी। उनकी शहंशाही का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि एक बार घर के सामने से एक ठेला निकला। ठेले पर टमाटर लदे थे। पिताजी उससे मोलभाव करने लगे। पूरे ठेले का क्‍या लोगे। कुछ लोगों ने टोका भी। सक्‍सेना साहब, इतने टमाटर लेकर क्‍या करोगे ? पिताजी नहीं माने ठेले पर रखे पूरे 30 किलो टमाटर खरीद लिए। टमाटर सड़ कर फिकें नहीं इस लिए बाद में उसे मोहल्‍ले में बांटा गया। उसका सास बनवाने के लिए बोतने खरीदी गई। सास बनवाने के लिए जो पैसे खर्च किए गए वह अलग। मैं और मां उनके इस अंदाज को लेकर हमेशा परेशान रहते थे। उन्‍हें सुधारने की हिम्‍मत हम दोनों में से किसी को नहीं थी।
खैर, बात चल रही थी कि मैं घर से अनिल बवाली के यहां जाने के लिए निकल पड़ा। अनिल के घर पहुंचा तो वह मेरा ही इंतजार कर रहा था। हम दोनों वहां से तारादेवी गुप्‍ता के घर कल्‍याणी पहूंच गए। तारा देवी के घर पर पूरा जमावडा था। लखनऊ से तमाम आर्टिस्‍ट वहां आए हुए थे। डांसर रेखा गर्ग, गिटारिस्‍ट आलोक सक्‍सेना, ढोलक, कांगो और बांगो और हारमोनियम के कलाकार अलग। कार्यक्रम की रिहर्सल चल रही थी। तारा देवी ने मुझे देखा तो अपने पास बुला‍ लिया। सबसे परिचय करवाया........ओपी नाम है इसका, अभी नया बच्‍चा है। कई अच्‍छे कैरीकेचर हैं इसके पास। मेहनत करेगा तो सीख जाएगा। आज और कल के दोनों प्रोग्राम यही एनाउंस करेगा। ......तारा देवी ने मेरी पीठ पर हाथ रखा।....मेरा हौसला बढाते हुए वह मुझे हाल के बीच तक लाई और बोली.......चल शुरू हो जा बेटा, एक ट्रायल हो जाए......।
मैने भी सहमति में सिर हिलाया और फिर जेब से कलम कागज निकाल कर कार्यक्रम का सीक्‍वेंस नोट करने लगा। इंट्रोडक्‍शन म्‍यूजिक के बाद मंच के इंस्‍ट्रूमेंटल कलाकारों का परिचय और फिर कुछ हल्‍की फुल्‍की शेरो शायरी के साथ किशोर कुमार के कुछ फिल्‍मी गाने, रेखा का डांस आदि आदि......। सीक्‍वेंस नोट करने के बाद मैने बतौर रिहर्सल एनांउसमेंट शुरू किया। ट्रायल के तौर पर कुछ शेरो शायरी और कैरीकेचर के साथ फिल्‍मी कलाकारों की आवाज में कुछ आइटम सुनाए तो्र वहां मौजूद कलाकारों में से कुछ ने तो मुंह बिचका लिया.....कुछ ने हौसला बढाया। कोई बात नहीं .....अभी नया है। धीरे धीर सब सीख जाएगा। इसी बीच गिटारिस्‍ट आलोक बोला .....हां, ठीक है , गांव के प्रोग्राम में तो चल ही सकता है। फिर वह और तारादेवी गुप्‍ता हाल से बाहर जाकर एक कोने में कुछ खुसर पुसर करने लगे। थोडी देर बाद तारा देवी ने मुझे आवाज दी......अरे, ओपी.....देखना बाहर दो जीपें खडी हैं। सब से बोलो पैकअप करें, चलने का टाइम हो गया है। मैने सभी को अपने अपने इंस्‍ट्रूमेंट समेटने को कहा। सामान पैक होने के बाद सभी लोग अपना अपना सामान उठा कर जीप की ओर चल दिए। मैं भी उनके सामान उठवाने में लग गया।
उस रात जब प्रोग्राम खत्‍म हुआ तो तारादेवी ने चलते समय मुझे 50 रुपये दिये और कहा कि कल के प्रोग्राम का एडवांस दे दिया है। टाइम पर पहुंच जाना। सच मानिए, उस दिन मिले पचास रुपये मुझे पचास लाख जैसे लग रहे थे। वह अलग बात है कि पिता जी के अच्‍छे समय में, मैं उस जैसे न जाने कितने पचास रुपये अपने स्‍कूल के दोस्‍तो को खिलाने पिलाने में उडा दिया करता था।
उस रात प्रोग्राम से लौटते समय जीप ने मुझे और अनिल बवाली को बडे चौराहे पर ही उतार दिया था। यहां से मैं और अनिल बवाल अपने अपने घरों के लिए चल दिय थे। रात के 3 बजे थे। जेब में पचास रुपये की गर्मी मैं बडी शिद्दत के साथ महसूस कर रहा था। साथ ही हिसाब जोडता जा रहा था कि अगर महीने में 15 प्रोग्राम मिलें तब कहीं जाकर महीने में पौने चार सौ रुपये कमा पाऊंगा। जरूरी नहीं कि महीने में 15 प्रोग्राम मिल ही जाएं......कम भी हो सकते हैं और ज्‍यादा भी ? इस तरह पचास रुपये कमा कर मैं खुश तो था पर संतुष्‍ट नहीं था...........मैने सोच लिया था कि इसके साथ ही साथ हमें कोई और काम भी करना होगा। संतुष्‍ट हुए कि प्रगति रुकी.........।
(क्रमश:)

व्‍यंग्‍य
सत्‍ताधीश बनाम आम आदमी

उस दिन प्रधानमंत्री का राष्‍ट्र के नाम संदेश सुनते सुनते मेरी आंख लग गई। मेरा समूचा अस्ति‍त्‍व सपनों की दुनियां में खो गया। मैने देखा कि अपने देश में एक नई व्‍यवस्‍था लागू हो गई है, जिसमें स्‍वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर पर दो मंच बने हैं। एक पर अपने प्रधानमंत्री खड़े हैं, बु‍लेट प्रूफ शीशे के पीछे, एसपीजी के जवानों से घिरे हुए और दूसरे मंच के पीछे एक आम आदमी खड़ा हुआ है बिना किसी सुरक्षा व्‍यवस्‍था के.....पूरी तरह असुरक्षित। यही तो फर्क है आदमी और प्रधानमंत्री होने में।
खैर, व्‍यवस्‍था यह है कि अपने प्रधानमंत्री और वह आम आदमी साथ-साथ राष्‍ट्र के नाम संदेश प्रसारित करेंगे। संदेश का प्रसारण शुरू होता है......प्‍यारे देशवासियों नमस्‍कार.....दोनों गंभीर मुद्र में हैं। प्रधानमंत्री क्‍यों गंभीर हैं पता नहीं। हो सकता है गंभीर और चिंतित दिखना प्रधानमंत्री पद की अनिवार्यता हो, लेकिन दूसरे मंच पर खड़ा आम आदमी गंभीर और चिंतित होने के साथ ही साथ दुखी भी है.....शायद इस लिए कि वह जानता है कि चाहे वह लाल किले की प्राचीर से बोले, बोट क्‍लब से बोले, सुदूर से बोले, पीलीभीत से बोले या कुम्‍हेर से.......उसकी आवज उसी तरह गुम कर दी जाएगी, मिट दी जाएगी जिस तरह संसद की कार्रवाई के टीवी प्रसारण में सांसदों के वा‍स्‍तविक चरित्र को उजागर करने वाले अंश मिटा दिए जाते हैं।
फिलहाल , राष्‍ट्र के नाम संदेश प्रसारित होना शुरू हो गया है। प्रधानमंत्री बोल रहे हैं। दूसरे मंच से आम आदमी बोल रहा है। दोनों की आवाजें एक दूसरे में गड-मड हो रही हैं। सरकारी भाषा में अर्थ का अनर्थ हो रहा है। प्रबुद्धजनों की भाषा में अनर्थ को अर्थ मिल रहा है।
प्रधानमंत्री बोल रहे हैं......एक साल पहले सरकार को जो विरासत मिली थी, उसमें सुधार लाने के लिए एक साल की जद्दोजहद के बाद कामयाबी मिली है...।
आम आदमी बोल रहा है....बहुत कामयाबी मिली है, हमने विश्‍वबैंक और हर्षद मेहता के हाथों की कठपुतली बन कर उनकी ही बुद्धि से पूरे देश का बजट बनाया है, ताकि देश की अर्थव्‍यवस्‍था और देश को खोखला करने की हमारी सत्‍तासित परंपरा जीवित रहे, बोफोर्स जीवित रहे, हर्षद मेहता जीवित रहे.......।
प्रधानमंत्री बोल रहे हैं.........देश की आर्थिक स्थिति सुधारने के मामले में हमें काफी कामयाबी मिली है। एक साल पहले तक हमें अपना सोना तक गिरवी रखना पड़ रहा था और उस समय तो सिर्फ एक हजार करोड़ रुपए की विदेशी मुद्र का भंडार बचा था हमारे पास जो मात्र एक सप्‍ताह में खर्च हो जाता, लेकिन सरकार ने सावधानी से फूंक फूंक कर कदम उठाए और आज.............
इसी बीच आम आदमी की आवाज उभरे लगती है...........और आज हमने अपने देश का सोना गिरवी रखने के स्‍थान पर पूरे देश की अर्थव्‍यवस्‍था को गिरवी रख दिया है। उद्देश्‍य पैसा लाना है। विदेशी मुद्रा लाना है। चाहे वह अंदर से आए या बाहर से। सोना गिरवी रख कर आए या पूरा देश गिरवी रख कर.....।
उधर प्रधानमंत्री बोल रहे हैं.........बाहर के लोग यहां परियोजनाओं में पैसा लगाएंगे तो भी वह परियोजनाएं यहीं रहेंगी। चाहे वह उद्योग हो , रेल हो, या सड़क हो....सब कुछ यहीं रहेगा।
आम आदमी बोल रहा है.........हां सब कुछ यहीं रहेगा, यहां के उद्योग, यहां के कारखाने, यहां की सड़कें, यहां के पुल, यहां की हरीभरी धरती, यहां की कल-कल करती नदियां, सब यहीं रहेगा। ठीक उसी तरह जैसे आजादी के पहले था। अंग्रेज न उस समय कुछ उठा कर ले गए थे और न इस बार कुछ ले जाया जाएगा........सब कुछ यहीं रहेगा।
प्रधानमंत्री बोल रहे हैं........देश के ऊसर क्षेत्रों को विकसित करने के लिए कार्यक्रम बनाए गए हैं। इसके लिए सरकार ने अलग से विभाग बनाया है। काफी धनराशि का प्रावधान भी किया है।
आम आदमी बोल रहा है........‍हमारी सरकार बहुत समझदार है। उसको चलाने वाले बहुत काबिल हैं। हमेशा देश और देशवासियों के हित के लिए कार्य करते हैं। संभवत: इसी लिए खेती योग्‍य भूमि किसानों से छीन कर उसपर होटल और मकान बनाए जा रहे हैं, वहीं ऊसर भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए पूरा एक विभाग बना कर करोड़ों रुपए खर्च करने की योजना तैयार की गई है। सिर्फ इतना ही नहीं, हमारे शासकों को देश के आर्थिक हित की कितनी चिंता है, इसका एक नमूना यह भी है कि वह विदेशों को जिस मूल्‍य पर खाद्यान्‍न निर्यात कर रहे हैं उससे कई गुना अधिक मूल्‍य पर विदेशों से खाद्यान्‍न खरीद रहे हैं। उनकी दलीलों के अनुसार देश का अर्थिक हित इसी तरह के सौदों में सुरक्षित रहेगा।
फिर प्रधानमंत्री की आवाज उभर रही है......देश को तोड़ने वाले संघर्षो पर अगले तीन वर्ष के लिए रोक लगा दी जानी चाहिए....।
आम आदमी बोल रहा है........जरूर, जरूर रोक लगा दी जानी चाहिए, ऐसी हर आवाज और ऐसे हर संघर्ष पर रोक लगा दी जानी चाहिए जो देश अर्थात उनकी कुर्सी को हिलाने और तोड़ने में सक्षम हो, क्‍योंकि उनके लिए तो देश मात्र उनकी कुर्सी तक ही सीमित है...।
इस तरह राष्‍ट्र के नाम संदेश का प्रसारण चल ही रहा था कि मेरे मानस पटल पर दृश्‍य बदलने लगता है। सामने मंच के पीछे गतिविधियां बढती नजर आती हैं। अचानक कोई फुसफुसाता है........अरे कोई रोको उसे....उसका बोलना ठीक नहीं है।
.....और तभी कोई, आम आदमी के नीचे से मंच रूपी उसका आधार खींच लेता है। आम आदमी लड़खड़ा कर गिरता है। मंच के आसपास भगदड़ मच जाती है। कोई उस आम आदमी का सिर कुचल देता है। थोड़ी देर बाद सबकुछ शांत हो जाता है। अखबारों में बड़े-बड़े हेडलाइंस छपते हैं........स्‍वतंत्रता दिवस समारोह में भगदड़। राष्‍ट्र के नाम संदेश देते आम आदमी की कुचलने से मृत्‍यु। घटना की जांच के लिए आयोग गठित। आम आदमी की सुरक्षा को ध्‍यान में रखते हुए उसके द्वारा राष्‍ट्र के नाम संदेश प्रसारण की नई व्‍यवस्‍था भंग.....अब सिर्फ प्रधानमंत्री बोलेंगे....सिर्फ प्रधानमंत्री। इसी बीच जाने क्‍यूं अचानक मैं चीख पड़ता हूं....मेरी नींद टूट जाती है। सामने देखतो हूं तो कुछ भी नहीं है, सिर्फ बिजली चले जाने से बंद पड़े टीवी की देश के भविष्‍य की तरह धुधली पड़ी स्‍क्रीन के सिवा.....कुछ नहीं .....कुछ भी नहीं।
(अमर उजाला के 4-10-1992 के अंक में प्रकाशित)